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Wednesday, 12 December 2018

एक ख्याल

Pic Source - Link

थोड़ा सा पाने की ज़िद में बहुत कुछ खो जाते हैं,
अहम की जीत में रिश्ते, अक्सर  हार जाते हैं.



Wednesday, 12 July 2017

पीछे रह गए वो दिन...



माँ कहती है हम नींद में मुस्कराते थे
बहुत पीछे रह गए वो दिन जब ख्वाब हमें परियों के आते थे

ज़िन्दगी मुस्करा के दामन में भरी थी
छोटी छोटी ख्वाइशों में खुशियां बड़ी थी
धीरे धीरे न जाने कब ख्वाइशें बढ़ती रही
न जाने कब वो खुशियां सिमटती रही
बहुत पीछे रह गए वो दिन जब एक चॉकलेट से हम खुश हो जाते थे
बहुत पीछे रह गए वो दिन जब ख्वाब हमें परियों के आते थे

एक पल में लड़ाई दूसरे में सुलह थी
शिकवों के लिए कहाँ दिल में जगह थी
रिश्ते मज़बूत हुआ करते थे, अहम् कमज़ोर
न जाने कब बढ़ सा गया मन में उस अहम् का शोर
बहुत पीछे रह गए वो दिन जब एक पल में रूठे दूसरे में मन जाते थे
बहुत पीछे रह गए वो दिन जब ख्वाब हमें परियों के आते थे

माँ कहती है हम नींद में मुस्कराते थे
बहुत पीछे रह गए वो दिन जब ख्वाब हमें परियों के आते थे

Tuesday, 31 May 2016

अधूरी नज़्म


Also published in AajSirhaane

अपनी पुरानी डायरी के पन्नो को पलटते हुए
बीते हुए पलों से मिलना चाहती थी
एक नज़्म दिखी उसमे अधूरी सी
उस अधूरी नज़्म को मैं पूरा करना चाहती थी

एक चौथाई पन्ने पर सिमटी
कुछ जख्मी से एहसासों में लिपटी
शायद मुझे कुछ याद दिलाना चाहती थी
उस अधूरी नज़्म को मैं पूरा करना चाहती थी

मेरे अपने ही वो ज़ज़्बात जैसे गैर हो चुके थे 
शब्दों की तरह अब कुछ धुंधले हो चुके थे
धुंधले से उन शब्दों को -जज्बातों को जाने क्यों पढ़ना चाहती थी
उस अधूरी नज़्म को मैं पूरा करना चाहती थी

कुछ शब्द नए जोड़े पर वो उसमे घुल न पाए
किसी पुरानी जीन्स में रफू की तरह अलग से उभर आये
अपने कल से अपने आज को जाने क्यों जोड़ना चाहती थी
उस अधूरी नज़्म को मैं पूरा करना चाहती थी

एक रोज मेरे ही दिल से निकली थी
लेकिन आज मुझसे ही कुछ अजनबी सी थी
कुछ कह कर भी कुछ छुपाना चाहती थी
शायद... हाँ शायद...
वो नज़्म अधूरी ही रहना चाहती थी

Sunday, 22 May 2016

दर्पण




जब भी किसी दोस्त की कमी महसूस करती हूँ
मैं दर्पण से बातें करती हूँ
 

मन कहता है ये मैं नहीं, कोई और है
मेरा हमराज़ मेरा हमदर्द है
वो मुझे समझाता है की मेरे ये आंसू
मेरी ही किसी मुस्कान का क़र्ज़ है
जाने किन् ख्यालों में हूँ
खुद ही हंसाती हूँ खुद ही हंसती हूँ
मैं दर्पण से बातें करती हूँ
 
बस यूँ महसूस होने ही लगा था
की अब किसी और दोस्त की ज़रूरत नहीं
भरम से जाग उठा ये मन तभी, बोला  
इस परछाई की कोई शक्शियत नहीं
मेरा दोस्त एक परछाई है
इस हक़ीक़त से डरती हूँ
मैं दर्पण से बातें करती हूँ
 
एक हवा का झोंका आया, मेरा दोस्त कहीं खो गया
रह गयी तो सिर्फ एक परछाई
इतना बाँट के भी कुछ बंट न सका
और गहरी हो गई मेरी तन्हाई
अपने अस्तित्व को फैला कर
फिर खुद ही सिमट जाती हूँ
मैं दर्पण से बातें करती हूँ

Sunday, 27 March 2016

यादों का बस्ता बहुत भारी हो गया


कुछ पल मैं लौटा दूँ वक़्त को
की यादों का बस्ता बहुत भारी हो गया.
धीरे धीरे ना जाने कब
मेरे आज पर हावी हो गया.

ज़िन्दगी की दौड़ से थक कर
कुछ पल चुराए थे छुप कर.
कुछ सुकूं सा मिला था दिल को
यादों की छाँव में रूककर.
लेकिन धीरे धीरे ये पल ना जाने कब
गुज़रे कल के हवाले हो गया.
कुछ पल मैं लौटा दूँ वक़्त को
की यादों का बस्ता बहुत भारी हो गया.

एक कदम आगे, दो पीछे चलते रहे
नए पन्नो पर पुरानी कहानी लिखते रहे.
एक नयी सुबह की चाह में
बड़ी देर तक वो पन्ने मुझसे लड़ते रहे.
शब्दों से भरा वो पन्ना
उम्मीदों से खाली हो गया.
कुछ पल मैं लौटा दूँ वक़्त को
की यादों का बस्ता बहुत भारी हो गया.

Wednesday, 3 February 2016

ज़िन्दगी

Photo Credit - Asha Dimri

एक एक पल से बुनी ये ज़िन्दगी

कुछ पलों में है हँसी तो कुछ में छुपी है ख़ामोशी


ये ज़िन्दगी तो हँसती रोती यादों का आशियाना है

रूठे पलों को जादू से कोई हमें मनाना है

यादों को चाहे साथी बना लो, बनाना ना हमसफ़र

यादों में रहती है उदासी, उदास न करना जीवन की डगर

यादों में खो जाती है कहीं पहचान आज की

कुछ पलों में है हँसी तो कुछ में छुपी है ख़ामोशी


हमने ज़िन्दगी से आने वाले कल का पता पूछा

तो वो हंसके हमें बोली इस आज को करो नहीं यु रुस्वा

बुरा नहीं जो इन आखों ने कल के सपने सजाये

पर उसके पीछे यूँ न भागो की ये आज कहीं खो जाये

बीते हुए ये पल फिर लौटाएगी नहीं ज़िन्दगी

कुछ पलों में है हँसी तो कुछ में छुपी है ख़ामोशी


हर पल नया कुछ रंग नए लाता है

हर गुज़रता लम्हा ये एहसास दिलाता है

एक पल की कीमत को हमने जाना है

किसी लम्हे को अब कहीं गंवाना नहीं

हर पल में न जाने कितनी सौगातें बसी

कुछ पलों में है हँसी तो कुछ में छुपी है ख़ामोशी